खेजड़ली बलिदान गाथा
जोधपुर के राजा अभय सिंह के महल की मरम्मत हेतु चूना पकाने के लिए लकड़ी की आपूर्ति के लिए मंत्री गिरधरदास भंडारी लकड़हारों के साथ खेजड़ली गांव में जाकर खेजड़ी के पेड़ काटने लगा। वृक्षमित्रों के मना करने पर भी जब हठधरमी मंत्री नहीं माना तो अमृता देवी बिश्नोई अपनी तीन लाडली बेटियों यथा रतनी बाई ,आसी बाई व भागू बाई तथा पति रामो जी खोड़ के साथ आ धमकी और मंत्री को ललकारा कि पेड़ हमें पुत्रों से भी प्यारे हैं इन्हें जान रहते काटने नहीं देंगे ।
यह कहते हुए कि "सिर सांटै रूंख रहै तो भी सस्तो जाण" अपनी तीनों बेटियों तथा पति के साथ पेड़ों से लिपट गयी, पापी मंत्री के लकड़हारों ने वृक्ष मित्रों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। देखते ही देखते आसपास के गांवों से सैंकड़ों वृक्ष मित्र आ पहुंचे तथा पेड़ों को बचाने हेतु अपनी जान न्यौछावर करदी परंतु पेड़ों को नहीं कटने दिया।
यह नरसंहार कई दिनों तक चलता रहा जिसमें 71 महिलाएं तथा 292 पुरुष सहित कुल 363 स्त्री पुरुष शहीद हो गए। यह घटना वि.सं. 1787 भादवा शुक्ल पक्ष दशमी तिथि( तेजा दशमी) सन 1730 को घटित हुई।
मां अमृता देवी की स्मृति में ही अमृता देवी नागरिक पर्यावरण संस्थान (अपना संस्थान) की स्थापना 3 जनवरी 2016 किशनगढ़ ,राजस्थान में हुई है।
खेजड़ली बलिदान गाथा और अपना संस्थान की स्थापना
जोधपुर के खेजड़ली गाँव में पेड़ों को बचाने के लिए 363 लोगों के बलिदान की स्मृति में किशनगढ़ में अपना संस्थान की स्थापना की गई थी।
