दैनिक भास्कर (भीलवाड़ा) ने अपना संस्थान द्वारा विकसित दो नवाचार मॉडलों पर विस्तृत फीचर प्रकाशित किया — रसोई बगिया एवं पंछी ढाबा।

रसोई बगिया — रसोई के कचरे से 13 पौधे, 10 साल तक
प्रयोग में लोहे के ड्रम में रसोई से निकलने वाले खाद्य पदार्थों के कचरे को बाहर फेंकने की बजाय उसी की खाद तैयार की जाती है।
- दरअसल रसोई में एक लोहे का ड्रम, नारियल के छिलके, गन्ने के छिलके, पेड़ों के सूखे पत्ते, मिट्टी, डी-कंपोजर सहित रसोई से निकलने वाली अन्य खाद्य सामग्री को ड्रम-खाद से तैयार किया जाता है।
- ड्रम में 13 छेद करके उसमें 13 अलग-अलग पौधे लगाए जाते हैं।
- इससे कम जगह में 13 पौधे तैयार हो जाते हैं और रसोई का कचरा 10 साल तक बाहर नहीं फेंकना पड़ता।
संस्थान के अध्यक्ष सुनील चौधरी ने बताया कि ड्रम को लगाने के लिए नारियल के छिलके, गन्ने के छिलके, पेड़ों के सूखे पत्ते, मिट्टी, डी-कंपोजर की आवश्यकता होती है।
राजस्थान सचिव विनोद मेलाना के अनुसार — अब तक भीलवाड़ा में रसोई बगिया के 26 ड्रम लग चुके हैं। 26वां ड्रम रविवार को लगाया गया। कौशल्या देवी, सृष्टि राठौड़, सुधा सिसोदिया, अमित राठौड़, निधि सिसोदिया, ओषी सिसोदिया सहित मंजोरधर समेत ड्रम में 13 तरह के पौधे लगाए। कार्यक्रम की मीडिया प्रभारी संजय लघू ने बताया कि फेसबुक पर लाइव प्रसारण ललित वर्मा ने किया।


पंछी ढाबा — पक्षियों के झूलने व दाना-पानी का अनोखा घर
स्थानीय भाषा में इसे "पंछी ढाबा" कहते हैं। ढाबे के साथ-साथ इसे "रेस्टोरेंट ऑफ बर्ड्स" भी कहते हैं। पक्षियों के आराम करने व खाने-पीने की हर व्यवस्था यहाँ है। घर के सुंदरता को भी बढ़ाता है और घर पर पक्षियों की चहक सुनने का सबसे कारगर उपाय है।
- अमूमन लोग मिट्टी के परिंडे में दाना-पानी के लिए बांधते हैं, लेकिन बढ़ाने के साथ-साथ पक्षियों के लिए पंछी ढाबे में झूला भी बनाया गया है — ताकि पक्षी दाना-पानी लेने के साथ-साथ झूल भी सकें।
- भीलवाड़ा में पिछले कुछ दिनों से यह प्रयोग देखने में आया है और शहर में अब तक करीब 100 लोग ऐसा पंछी ढाबा लगा चुके हैं।

सहयोगी संगठन
महावीर इंटरनेशनल जोन चित्तौड़गढ़ (राज.) के साथ सामूहिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। मिट्टी के परिंदों के ढेर से सैकड़ों पक्षियों को दाना-पानी की व्यवस्था उपलब्ध कराई गई।

दस्तावेज़
संस्थान ने इस मॉडल पर एक विस्तृत प्रस्तुति भी तैयार की है — रसोई की बगिया — विस्तृत प्रस्तुति (PDF)।
